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हजारों ख्वाईशे
हजारों ख्वाहिशें नहीं मेरी
फिर भी लोग खुशमिजाज बोलते ।
अपनी ही धुंध में जिती हूं मगर
ये ऑंखे हैं जो चुपचाप राज खोलते ।
आंसू बहाने का भी मन नहीं अभी
पर बेजुबान बातें ही सब जानते ।
इतनीसी दर्यादिली दिखाकर कभी
कोई बीच मंझधार में लाकर छोड़ते ।
नहीं कोई अब शिकवा गिला किसी से
बस अब चलते जाना है सिधे रास्ते।
ऑंधिया हो तुफान हो कितने भी खडे
चलना हैं अब सिर्फ अपने वास्ते, अपने वास्ते ।
वैशाली अंड्रस्कर
ता.जि.चंद्रपूर
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