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कर्म
कर्म चांगले , करत रहा।
सुखी जीवन,जगत रहा।।
व्देष ईर्षेला नकोच थारा।
सदा प्रेमाने, हसत रहा।।
नित्य माणसा,थोर राहूनी
माणूसकीला,जपत रहा।।
बुध्द भीमाचे ,विचार अंगी।
पंचशीलेला, स्मरत रहा।।
समाज ऋण ,भान ठेवूनी।
लोक सेवेत , झिजत रहा।।
जातीयतेला , ठोकर मारा।
मानवतेनी , झरत रहा।।
अंधारी जगी, प्रज्ञा प्रकाश।
दीप होऊनी , जळत रहा।।
हाव सुखाची,नकोरे करु।
दुःखात जरा , रमत रहा।।
गोवर्धन तेलंग
पांढरकवडा जि.यवतमाळ
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